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  • बढ़ते हुए तापमान के बाद नदियों का अस्तित्व खतरे में है, वैचारिक शून्यता छोटी नदियों को पहले ही खत्म कर चुकी है, यकीन मानिये यदि स्थिति नहीं सुधरी तो नदियां पाताल में समा जाएंगी...। प्रकृति दर्शन पत्रिका का प्रवेशांक नदियों पर ही केंद्रित किया गया....।

  • सूखा वैश्विक चिंता है ये भारत में भी दस्तक दे चुका है...दूसरा अंक सूखे पर केंद्रित किया। सूखा हमारे मानव जीवन को गहरे तक खत्म कर रहा है।

  • बाढ़ प्राकृतिक आपदा नहीं है उसे हमने ही तैयार किया है, वो हमारी लापरवाही और अज्ञानता के कारण अब बढती जा रही है। प्रकृति दर्शन का तीसरा अंक बाढ़ पर केंद्रित है इसमें इसके कारण और निदानों को प्रमुखता से उकेरा गया है।

  • प्रकृति को संवारने और सहेजने में बेशक जमीनी प्रयास ही सबसे बेहतर कदम हैं लेकिन साहित्य हमेशा से बेहतर करने के लिए प्रेरित करता है। कहानी संग्रह- ‘हरी चिरैया’ भी प्रकृति संरक्षण पर आधारित है ये हममें वैचारिक सुधार का अंकुरण करता है।

  • प्रदूषण दुनिया की सबसे तेजी से बढती समस्या है जिसका कोई तात्कालिक हल किसी के पास नहीं है, जल-वायु-भूमि सभी प्रदूषण का शिकार हो रही है जीवन संकट की ओर तेजी से भार रहा है। चतुर्थ अंक इसी अहम और विकराल होती समस्या पर है।....

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